'मेरे विचार' ब्लॉग का विचार मेरे मन में केवल इसलिए आया कि क्यों न अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए इसे तैयार किया जाए ताकि समय.समय पर नवीन जानकारी शेयर की जा सके। इस ब्लॉग के द्वारा मेरा प्रयास व्यंग्य के माध्यम से अपने विचारों को सांझा करना है।
लेखक: डॉ भीम सिंह दहिया अनुवादक: डॉ सुभाष चन्द्र अमेज़न प्राइज : 351₹ हरियाणा की राजनीति में शुरू से ही जाति व्यवस्था रही है, इस बात के साक्ष्य सन 1916 में चौधरी छोटूराम द्वारा प्रकाशित सप्ताहिक पत्र 'जाट-गजट' व पंडित श्रीराम शर्मा द्वारा 1923 में प्रकाशित 'हरियाणा तिलक' के रूप में मिलते हैं। हरियाणा में जाति आधारित राजनीति अपने प्रगाढ़ रूप में देखने को मिलती है लेकिन जब हम अपने बच्चे को स्कूल या ट्यूशनभेजते समय अध्यापक की जाति नहीं उसकी योग्यता, ईमानदारी, निष्ठा देखते हैं वहीं इलाज कराने के लिए जाने से पहले डॉक्टर की जाति नहीं बल्कि उसका ज्ञान देखते हैं तो क्या यह सोचने की बात नहीं है कि वोट देने से पहले नेता की जाती क्यों देखते हैं? इन सवालों का जवाब इस बहु प्रतिष्ठित किताब "हरियाणा में सत्ता की राजनीति: जाति और धन का खेल में मिलते हैं। हरियाणा में राजनीति की शुरुआत में दो ही पार्टियां थीं जिनमें यूनियनिस्ट पार्टी व कांग्रेस पार्टी का नाम सामने आता है। सन 1923 में युनियनिस्ट पार्टी के चौधरी छोटूराम ने पंजाब के समूचे किसान वर्ग को संगठित करने का बीड़ा उठ...
सारी दुनिया पानी भर रही है! चौंकीदार - पीआॅन का पीआॅन - क्लर्क का क्लर्क - हैड क्लर्क का हैड क्लर्क- आॅफिसर का आॅफिसर - सीनियर आॅफिसर का सीनियर आॅफिसर - ब्रांच आॅफिसर का ब्रांच आॅफिसर- हैड आॅफिसर का हैड आॅफिसर- मेन आॅफिसर का मेन आॅफिसर- मंत्री का मंत्री- सरकार का और नतीजा॰॰॰॰॰॰॰ "स्कूल में कैंप --बच्चे बाहर कालेज में प्रोग्राम--बच्चे कक्षा से बाहर युनिवर्सिटी में ईवंट-- बच्चे व शिक्षक सभी सरकारी देख रेख में " अधिकतर कर्मचारी इन सभी ड्यूटी पर जैसे- वोट बनवाना, शौच को देखना आदि और बाकी जो रह गया वो है 'विकास' ----रोशन मस्ताना
किसान कभी उग्र नहीं होता किसान कभी उग्र नहीं होता क्या ज़रूरत है किलेबंदी की बेवजह सड़क पर बैरिकेड, जमाबंदी की क्योंकि किसान कभी उग्र नहीं होता किसान उग्र होता है जब पकी फ़सल पर बरसात हो मेहनत पर फिर जाए पानी और ख़त्म उसके जज़्बात हों किसान उग्र होता है जब पकी हुई गेहूं में लग जाती है आग नहीं बुझती फिर क़र्ज़दाता की प्यास किसान उग्र होता है जब पड़ जाए सूखा फिर चाहे पशु हो या परिवार सोना पड़ सकता है भूखा किसान उग्र होता ...
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