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चटनी (सरकार) को लेकर पिछले कई दिनों से ही टमाटर व प्याज में बहस छिड़ी हुई थी। टमाटर (पायलट) कहता है कि मेरे बिना तुम्हारा कोई वजूद नहीं है, मेरे बिना चटनी (सरकार) बन ही नहीं सकती। प्याज (गहलोत) इस बात पर अड़ा रहा कि सब कुछ मैं ही हूँ। धनिया, पुदीना, नमक, हरी मिर्च (बाकि के एमएलए) यह सब देख सुन रहे थे और सोच रहे थे कि हम कहां जाए। इन सब के बिना भी तो चटनी बन नहीं सकती। चटनी को यह भी सोचना चाहिए था कि अब तक तो सब ठीक था जब तक नींबू (बीजेपी) नहीं डला था। नींबू के आने के बाद चटनी में बाकि सब के स्वाद फीके हो गए। चटनी(सरकार) लगभग खत्म सी हो गई। यहां लोगों को भी यह समझना चाहिए कि कोई भी चटनी (सरकार) लम्बे समय तक रहने से खराब हो जाती है उसका स्वाद कसैला हो जाता है तो ऐसे में समय मिलते ही नई चटनी (सरकार) बनाने के बारे में सोचना चाहिए ताकि जायका बना रहे।

शराब को कोई दोष न देना और न ही शराबियों को

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कोरोना काल में जब देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था को पहिए लगाने के लिए यदि सरकार ने शराब, शराबियों को उपलब्ध करवा ही दी तो इसमें हाहाकार मचाने की क्या जरूरत है?        आज हम यह जान लें कि एक ही दिन में राज्य सरकारें कितने की दारू बेचने में सफल हुई हैं । सबसे पहले महाराष्ट्र को लेते हैं, महाराष्ट्र में 11 करोड़ रुपये व उत्तर प्रदेश में लगभग 100 करोड़ रुपये की शराब बिकी व और हरियाणा लगभग 3000 करोड़ के मासिक रिवेन्यू की हानि सहन कर रहा है।       चलिए थोड़ी सी बात कर लेते हैं कोरोना की इस समय पूरे भारतवर्ष में 50,000 के कोरोना के केस सामने आ चुके हैं और अकेले महाराष्ट्र में यह संख्या 15000 से ऊपर है शराब की बिक्री को लेकर मीडिया व सोशल मीडिया में अलग-अलग तरह से लोग अपने मत को प्रकट कर रहे हैं लेकिन यह ध्यान रखने योग्य बात है कि शराब का करोना से कोई संबंध नहीं है हां यह बात जरूर है कि जमातियों, नांदेड़ साहब व शराबियों की जमात करोना के प्रसार में अहम भूमिका निभा (सकते) रहे हैं।       लगभग 45 दिन के लोकडाउन...

Book Review: Haryana main Satta ki Rajniti

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लेखक: डॉ भीम सिंह दहिया अनुवादक: डॉ सुभाष चन्द्र अमेज़न प्राइज : 351₹ हरियाणा की राजनीति में शुरू से ही जाति व्यवस्था रही है, इस बात के साक्ष्य सन 1916 में चौधरी छोटूराम द्वारा प्रकाशित सप्ताहिक पत्र 'जाट-गजट' व पंडित श्रीराम शर्मा द्वारा 1923 में प्रकाशित 'हरियाणा तिलक' के रूप में मिलते हैं। हरियाणा में जाति आधारित राजनीति अपने प्रगाढ़ रूप में देखने को मिलती है लेकिन जब हम अपने बच्चे को स्कूल या ट्यूशनभेजते समय अध्यापक की जाति नहीं उसकी योग्यता, ईमानदारी, निष्ठा देखते हैं वहीं इलाज कराने के लिए जाने से पहले डॉक्टर की जाति नहीं बल्कि उसका ज्ञान देखते हैं तो क्या यह सोचने की बात नहीं है कि वोट देने से पहले नेता की जाती क्यों देखते हैं? इन सवालों का जवाब इस बहु प्रतिष्ठित किताब "हरियाणा में सत्ता की राजनीति: जाति और धन का खेल में मिलते हैं। हरियाणा में राजनीति की शुरुआत में दो ही पार्टियां थीं जिनमें यूनियनिस्ट पार्टी व कांग्रेस पार्टी का नाम सामने आता है। सन 1923 में युनियनिस्ट पार्टी के चौधरी छोटूराम ने पंजाब के समूचे किसान वर्ग को संगठित करने का बीड़ा उठ...