Cold War on Social Media
सोशल मीडिया पर शीत युद्ध
लगातार बढ़ रहे सोशल मीडिया के वर्चस्व का राजनितिज्ञओं द्वारा खूब प्रयोग किया जा रहा है । राइटिस्टों ने भी जंहा अपने आप को सर्वोच्च साबित करने की कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं वहीं लफ्टिस्ट कहाँ पिछे रहने वाले है । आजकल फेसबुक व व्हाट्स अप पर चल रहे इस शीत युद्ध का क्या हल निकलेगा यह तो समय के गर्भ में है लेकिन भक्त प्रजाति तो इस कदर हावी है कि यदि कोई व्यक्ति भूल से भी यह कह दे कि इस बार सर्दी बहुत पड़ेगी तो तुरंत सोशलिस्ट यह कह देंगें कि क्या कांग्रेस राज में सर्दी नहीं पड़ी थी ।
सोशल मीडिया पर चल रही विभिन्न हैडलाइंस को यदि ध्यान से देखा व परखा जाए तो ये कभी भी सता् परिवर्तन करवा सकती हैं । अमेरिका का उदाहरण हमारे सामने है । वहां सोशल मीडिया कैंपेनिंग लगातार हावी रहीं है । इस बार डोनाल्ड ट्रम्प की उम्मीदवारी का समर्थन पोप ने किया था । झूठे समाचार केवल दक्षिणपंथीयों का कारनामा है । माननीय मोदी जी की जीत में भी सोशल मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई है ।
लेकिन एक बात तो तय है कि मार्क ज़गरबर्ग को फेसबुक पर झूठी खबरों की समस्या से तो जूझना तो पड़ ही रहा है । अकेले भारत ही नहीं अन्य देशों को भी प्राइवेसी व कंटेंट शेयरिंग का डर तो सता ही रहा है । व्हाट्स एप को 2014 में अधिग्रहण के समय यह विश्वास दिलाया गया था कि डेटा को फेसबुक के साथ सांझा नहीं किया जाएगा । कुछ समय पहले तक इन खबरों का वर्चस्व रहा है कि फेसबुक डेटा शेयर कर रहा है ।
पते की बात यह है कि सोशल मीडिया जहां बातचीत, वर्चुअल दुनिया, परिचर्चा आदि का सशक्त माध्यम है वहीं विश्वसनीयता को लेकर प्रश्न चिन्ह भी है । जिससे न केवल इसके विज्ञापन प्रभावित हुए है बल्कि इसके शेयर मूल्यों में भी गिरावट आई है ।
_____रोशन मस्ताना
लगातार बढ़ रहे सोशल मीडिया के वर्चस्व का राजनितिज्ञओं द्वारा खूब प्रयोग किया जा रहा है । राइटिस्टों ने भी जंहा अपने आप को सर्वोच्च साबित करने की कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं वहीं लफ्टिस्ट कहाँ पिछे रहने वाले है । आजकल फेसबुक व व्हाट्स अप पर चल रहे इस शीत युद्ध का क्या हल निकलेगा यह तो समय के गर्भ में है लेकिन भक्त प्रजाति तो इस कदर हावी है कि यदि कोई व्यक्ति भूल से भी यह कह दे कि इस बार सर्दी बहुत पड़ेगी तो तुरंत सोशलिस्ट यह कह देंगें कि क्या कांग्रेस राज में सर्दी नहीं पड़ी थी ।
सोशल मीडिया पर चल रही विभिन्न हैडलाइंस को यदि ध्यान से देखा व परखा जाए तो ये कभी भी सता् परिवर्तन करवा सकती हैं । अमेरिका का उदाहरण हमारे सामने है । वहां सोशल मीडिया कैंपेनिंग लगातार हावी रहीं है । इस बार डोनाल्ड ट्रम्प की उम्मीदवारी का समर्थन पोप ने किया था । झूठे समाचार केवल दक्षिणपंथीयों का कारनामा है । माननीय मोदी जी की जीत में भी सोशल मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई है ।
लेकिन एक बात तो तय है कि मार्क ज़गरबर्ग को फेसबुक पर झूठी खबरों की समस्या से तो जूझना तो पड़ ही रहा है । अकेले भारत ही नहीं अन्य देशों को भी प्राइवेसी व कंटेंट शेयरिंग का डर तो सता ही रहा है । व्हाट्स एप को 2014 में अधिग्रहण के समय यह विश्वास दिलाया गया था कि डेटा को फेसबुक के साथ सांझा नहीं किया जाएगा । कुछ समय पहले तक इन खबरों का वर्चस्व रहा है कि फेसबुक डेटा शेयर कर रहा है ।
पते की बात यह है कि सोशल मीडिया जहां बातचीत, वर्चुअल दुनिया, परिचर्चा आदि का सशक्त माध्यम है वहीं विश्वसनीयता को लेकर प्रश्न चिन्ह भी है । जिससे न केवल इसके विज्ञापन प्रभावित हुए है बल्कि इसके शेयर मूल्यों में भी गिरावट आई है ।
_____रोशन मस्ताना

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